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कलम यानी लेखनी यानी पेन! 🖋️
हमलोगों की पढ़ाई की शुरुआत वाचन से फिर लेखन से हुई है। पहले तख्ती या स्लेट पर चॉक से फिर खट्ठे की कलम से। अंततः पेन से। अब तो सीधे डिजिटली हो गए हैं , कलम भी पुरानी बात हो गई है।
आजकल बच्चें जो पब्लिक स्कूल में पढ़ते हैं वे प्रारंभिक दिनों में पेंसिल भी यूज करते हैं। इसे हमलोग बचपन में कठपेंसिल बोलते थे। स्लेट पर भी एक तरह की पेंसिल से ही लिखते थे। बाद में इकरी जो हमारे इलाके में खूब होते हैं उनसे कलम बना लिखते थे। इकरी को खट्ठा भी कहते थे। इसे स्याही में डुबो डुबो लिखते थे। यह लेखन सुलेख हेतु जरुरी था और एक तरह से योगाभ्यास सदृष्य ही था। स्याही उतनी ही लेनी होती थी कि वह कागज पर फैले नहीं। अगर किसी कारण फैल जाए तो उसके लिए सोखता पेपर होता था, ब्लोटिंग पेपर।
फिर आया कलम का दौर। तब कलम भी निंब की हुआ करती थी। मैं इंटरमीडिएट तक निंब वाली कलम से ही लिखता रहा हूं। अब भी लिखता हूं पर शौक़िया।
उस वक्त निंब वाली कलम कुछ ही ब्रांड की आती थी जिनमें एक पायलट होता था। क्लिपर भी एक ब्रांड था जो तब बड़ी महंगी मिलती थी सवा रुपए में। उसका बॉडी मेटल का होता था। सामान्यतया पचास पैसे से एक रुपए में शानदार कलमें मिल जाती थी।
तब कलम का मतलब यह नहीं था कि लिखो और फेंको। यह जनम जनम का साथ जैसा रिश्ता था। कोई चुरा ले या खो जाए तभी साथ टूटता था। इस साथ टूटने पर घर पर डांट या कभी कभी मार खाने की भी नौबत आ जाती थी।
तब कलम का सबसे महत्वपूर्ण पार्ट निंब हुआ करती थी। इसे एक जीभिया के साथ मिला कर पेन के होल्डर में लगा देते थे। निंब भी कभी कभी टूट जाए या दांत निपोर दे। तो उसे बनवाना पड़ता था या फिर बदलवाना। कभी कभी जाम भी हो जाए तो कलम को झाड़ झाड़ ठीक करते थे। इस झाड़ फूंक में किसी साथी का शर्ट भी खराब हो जाता था जिसके कारण स्कूल की छुट्टी के बाद अच्छी कुटाई कार्यक्रम चलता था। इस कलम की एक परेशानी भी हुआ करती थी , यह लीक भी करती थी जिसे रोकना बड़ी जुगत की बात थी।
कलम बड़ी या तलवार पर हमलोग बहुत निबंध लिखे हैं पर बचपन में कलम को तलवार के रूप में यदाकदा यूज करते रहे हैं। तलवार न कह भाला कहें तो ठीक होगा। झगड़े में इससे भोंकाभोंकी हो जाती थी। हमलोग जब इसके बाद रोते हुए घर आते थे तो वहां भी विरोचित स्वागत सत्कार होता था।
मेरे बड़के जीजा जी जो इंजीनियर थे उनके पास क्लिपर पेन थी। वो ब्लैक परफेक्ट परमानेंट जो चेलपार्क की स्याही होती थी उसको यूज करते थे। मांगने पर नहीं देते थे तो बाद में मैं भी क्लिपर पेन खरीदा और वही इंक भी। लिखता ऐसा था जैसे कोई छाप रहा है।
निंब वाली कलम से अक्षर सुंदर बने। गोल गोल। देखे तो लोग मोहित हो जाए। कुछ प्रेम पत्र मैंने ऐसे ही पेन से लिखे। प्रेम पत्र लिखने का मैं कुछ भी मेहनताना नहीं लेता था। बस कुछ खिला पिला दो एक प्रेम पत्र लिख देता था। आप सही सोच रहे हैं, हां मैं दूसरों के भी प्रेम पत्र लिख दिया करता था। पर एक घटना के बाद वह काम भी मैं छोड़ दिया। हुआ कि मेरे लिखे प्रेम पत्र को मेरा साथी मेरी ही दोस्त को दे दिया जिसका परिणाम उसके लिए बहुत ही पॉजिटिव हुआ। उसके बाद ऐसे कार्य करने से मैं तौबा किया।
खून से कभी प्रेम पत्र नहीं लिखा। हिम्मत ही नहीं हुई। मेरा पिछला पोस्ट देख आप सोचते होंगे कि यह खून से भी पत्र लिखता होगा। पर जिसके शरीर में पर्याप्त खून ही नहीं हो वह क्या खाक लिखेगा, खून से प्रेम पत्र !?
तब गिफ्ट में एक जोड़ी कलम देने का रिवाज था। एक सुंदर डिब्बे में एक फाउंटेन पेन और दूसरी लीड वाली पेन। कुछ तो अभी भी हैं मेरे पास। स्याही की कलम अभी भी मेरे पास है। मेरी छोटी बहन हर राखी को एक सुंदर कलम देती है तो छोटे बहनोई नए साल पर कलम के साथ डायरी। अभी पिछले दिनों पूर्व आई जी, प्रान्तोष जी ने भी एक फाउंटेन पेन गिफ्ट किया है।
पार्कर पेन का एक प्रतिष्ठित ब्रांड है। 1960 के दिनों में बाबूजी को पार्कर की एक कलम थी। कहते थे कि उसकी निंब सोने की थी। यह सही बात थी या नहीं, कह नहीं सकता ? उस कलम को बाबूजी से रो धो कर हथिया लिया था पर मुझ से वह कलम खो गई जिसका मुझे आज भी बहुत अफसोस है। वास्तव में उसे कोई चुरा लिया था।
कलम की कहानी अनंत है। फिर लिखूंगा कभी जब मूड करेगा। अभी इतना ही।
© डॉ शंभु कुमार सिंह
पटना, 30 जुलाई 25
