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अचार पर विचार

by Dr Shambhu Kumar Singh

अचार पर विचार

हम गंवई लोग हैं। सीधा साधा । आचार-व्यवहार पर बहुत विचार करते हैं। त संयमित भी रहते हैं।बचपन में कभी कभी संयमित नहीं होते थे तो बहुत बुरी तरह हमें संयमित कर दिया जाता था।
बचपन में नियम था ,अर्ली टू बेड एंड अर्ली टू राइज । यह आचार इतना रूढ़ था कि इसमें थोड़ी भी कमी हो जाये तो बाबूजी लप्पर थप्पर से विचार कर देते थे। तो ऐसे वैचारिक माहौल में रहने का ही परिणाम है कि मैं बहुत ही विचारशील हो गया।विचार इतना कि रखने को दिमाग में भी जगह नहीं तो सोचा आज यहीं इसे उड़ेल देता हूँ। कोई न कोई गुणी जन की नजर पड़ ही जाएगी!
तो आज का विचार “अचार” पर है। आचार पर नहीं। आचार और अचार दो अलग चीज है। अचार की परिभाषा यही है कि जिसे देखते ही मुँह में पानी आ जाये वह अचार! का सखि, मुँह में पानी ,ना सखि ,अचार ! ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक बहुत ही विद्वान प्रोफेसर का भी कहना है कि अचार भोजन को कंठ के नीचे ठेलने वाले उत्प्रेरक को कहते हैं । चूंकि यह यूनिवर्सिटी की बात है तो थोड़ी गूढ़ भी है। अतः यह परिभाषा ज्यादा सटीक है कि अचार वह पदार्थ है जिसकी याद ही मुँह में पानी भर दे। अब एक बार बड़की भउजी की मंझली बहिन की शादी के समय जबरदस्त शहनाई की महफ़िल जमी हुई थी। तभी बड़की भउजी का सबसे छोटा बेटा कहाँ न कहाँ से अचार खाते महफ़िल में आ गया । अब तो शहनाई जो महफ़िल में शमां बांधे हुई थी वह मिमियाने लगी। बार बार शहनाई वादक मुँह में आये पानी समेट रहा था। महफ़िल का मजा ही किरकिरा हो गया। तो इतनी पॉवरफुल है यह अचार !

अचार बहुत चीजों का बनता है। बोलिये तो किसका नहीं बनता? पत्नी पति का डाल देती है चाहे कितना भी तीसमार खां पति क्यों न हो ! सरकार हर वह योजना का अचार डाल देती है जिससे कुछ भी विकास होने की बात हो ! तो आप किसी भी चीज का अचार डाल सकते हैं। नेता लोग चुनाव काले विपरीत बुद्धि आचार संहिता का अचार डाल देते हैं। पर गांव में आम ,कटहल ,नींबू, करौंदा आदि के अचार डाले जाते हैं। अचार के लिए सबसे उपयुक्त खट्टा पदार्थ होता है। पर हमेशा खट्टा का ही अचार नहीं डाला जाता । हमारे वैशाली जिला में आलू का अचार भी बनाया जाता है। कुनरी का भी । आप मीठा अचार भी बना सकते हैं।

आम का मौसम है। तो यह अचार का भी मौसम है।आम में भी सुकुल आम खट्टा होता है । तो ज्यादातर इसी का अचार डाला जाता है। लंबे लंबे फांक का अचार बनाये या छोटे ,स्वाद में एक ही मजा है! जीभ चटपट करने लगती है। लंबे फांक के अचार का गूदा खा आप उसकी आंठी को चम्मच बना सकते हैं। बचपन में इसी चम्मच से हम भी खूब दाल सुरुके हुए हैं।

अचार में तेल नहीं डाले तो अचार खराब हो सकता है। इसे धूप भी दिखाना बहुत आवश्यक है। बिना तेल का अचार चोखटायेल ! कड़ा। खाइये ,कोई मजा नहीं ! तेल वाला शानदार! कुछ लोग इसमें सिरका भी डालते हैं। होटल आदि में यही अचार मिलता है सिरकामय ! चाट कर देखिएगा तो पता चलेगा कि असली अचार क्या होता है!

अचार आप किसी भी चीज के साथ खा सकते हैं। चावल दाल ,रोटी ,पूड़ी ,भूँजा – जो भी पसंद हो । पर ई अचरवा को खिचड़ी के साथ खाइयेगा तो अहा, क्या गज्जब का स्वाद आएगा! कहा भी गया है ,खिचड़ी के चार यार ,दही ,पापड़ ,घी अचार ! सफर के लिए अचार बहुत ही उपयोगी खाद्य पदार्थ है। पूड़ी अचार खा एक लंबी डकार ले बर्थ पर लमलेट हो जाइए। अचार में एक खूबी यह भी है कि यह टिकता बहुत है। शर्त है कि इसको धूप दिखाते रहें। नहीं दिखाने पर सड़ सकता है। एक बात और , यह कि अचार को रजस्वला स्त्री छू दे तो अचार सड़ जाता है, यह झूठ बात है। बल्कि ऐसा कहने वालों का दिमाग सड़ा रहता है।

अचार गरीबों का सहारा है। सर्वहारा पदार्थ है। पर यह अमीरों को भी प्रिय है! अचार बनाने का अभी ही सीजन है। आम का जरूर बनाइये। अगर नहीं बनाए हैं तो जल्दी कीजिये। बरसात अचार बनाने का मौसम नहीं है। आप अचार बाजार से भी खरीद सकते हैं। बहुत सी कम्पनियां भी अचार बनाती हैं। बहुत सी महिलाओं के लिए अचार निर्माण उनकी रोजी रोटी का भी सहारा है। तो यही कहूंगा कि अचार बनाइये और खाइये भी । खिलाइये तो जरूर। कोई महिला जब तब अचार को खाने को उद्दत दिखे तो जरूर समझे कि कोई नया मेहमान आने वाला है! अचार किसी किलकारी की पहली मिठास भी हो सकता है। इसे केवल खट्टा ही नहीं समझें! तो आज इतना ही ।
अभी श्रीमती जी खाने हेतु बुला रही हैं।
हे भगवान , आज भी रोटी और अचरवे !

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© डॉ. शंभु कुमार सिंह
12 जून ,21
पटना
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