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अपराध का अर्थशास्त्र

by Dr Shambhu Kumar Singh

अपराध का अर्थशास्त्र

बहुत पहले एक वीडियो देखी थी जिसमें पूर्व पुलिस प्रमुख ,बिहार ,अभयानंद अपराध के अर्थशास्त्र पर चर्चा कर रहे थे। अभी कल और आज उनका दो इंटरव्यू भी देखा उसमें भी वे अपराध के अर्थशास्त्र पर अपनी बात कह रहे हैं। मैं अभयानंद जी से कई बार मिला हूँ और जब भी उनके साथ चर्चा होती है कुछ सामाजिक ,आर्थिक आदि महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात हो ही जाती है। आज भी सुबह सुबह इन्हीं मुद्दों पर चर्चा हुई । एक शिक्षा शास्त्री और सामाजिक चिंतक के अलावा अभयानंद जी पुलिस के एक सफल और सक्षम अधिकारी रहे हैं। उनकी बातें उनके कार्यकाल के अनुभवों का निचोड़ भी है साथ ही उनके बौद्धिक विवेचन का एक प्रतिफल भी ।

वे कहते हैं कि कोई भी अपराधी जब अपराध करता है तब वह मूलतः धन केलिये ही अपराध करता है। कम ही अपराध होते हैं जो बदले की भावना , तात्कालिक आवेश में आकर कर दिए जाते हैं ! उन्होंने पुराने मध्य बिहार की चर्चा करते हुए कहा कि यहाँ ईंट भट्ठे की बहुतायत है साथ ही बालू ,शराब आदि के भी क्षेत्र हैं तो यहाँ अपराध धनबल केलिये ही होते रहे हैं। इस तरह केवल वर्चस्व ,आर्थिक दोहन और क्षेत्र विस्तार हेतु ही अधिकांश अपराध होते हैं।
उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर कहाकि बेतिया आदि जगहों में भी चीनी मिल , गन्नों आदि के कारण अपराध होते रहे हैं। क्योंकि इससे आर्थिक लाभ होते हैं। पुराने बिहार के कोयलांचल में भी अपराध का मूल केवल आर्थिक साम्राज्य ही रहा है। अवैध वसूली ,नक्सलियों या अन्य संगठनों के द्वारा लेवी की वसूली भी इसी अपराध के अर्थ केलिये होती है।
मेरी नजर में भी अपराध का मूल कारण आर्थिक साम्राज्य की स्थापना करना ही है। बिहार में जमीन से जुड़े अधिकांश झंझटों को देखने पर यही सत्य नजर आता है।क्रसर के व्यापार में भी ऐसी ही बात है। जो बाहुबली राजनीति में आते हैं वे सुधर जाने के कारण या सुधार करने के निमित्त नहीं आते हैं वरन आर्थिक लूट ही उनका मूल ध्येय होता है! वे राजनीति में आते ही हैं कि क्राइम को ज्यादा सुरक्षित ढंग से किया जाए और कमाई अधिकाधिक हो।
अभयानंद जी के अनुसार आर्थिक क्षेत्र या वर्चस्व के क्षेत्र विस्तार हेतु भी लोग अपराध करते हैं कारण कि इससे उनके आर्थिक हित जुड़े होते हैं। उनका कहना है कि अपराधियों के आर्थिक साम्राज्य की जब्ती एक बड़ी टूल हो सकती है ऐसे अपराधियों की रीढ़ तोड़ने हेतु। ऐसी ही बात धार्मिक क्राइम में भी देखी जाती है। सेक्स क्राइम में सेक्स एक महत्वपूर्ण फैक्टर तो है ही पर इससे कमाई भी होती है तो इस क्षेत्र में भी काफी आपराधिक कार्य होते हैं। वेश्यावृत्ति दुनिया का सबसे पुराना व्यापार है जिसका आधार ही अपराध है। तो मुझे लगता है कि बहुत कम ही अपराध होते हैं जिनके मूल में आर्थिक हित नहीं जुड़े हुए होते हैं! कम ही अपराध होते हैं जो भावनावश होते हैं या आवेश में किये गए होते हैं। कुछ ईगो, कुछ बदले की भावना से भी अपराध होते हैं जो उन अपराधों के ठीक अलग हैं जो आर्थिक हित के लिए होते हैं। अभयानंद जी इसे पैशन अपराध कहते हैं।
एक बात और , अल्प संख्यक कोई भी हो ,जातिगत के रूप में या धार्मिक या जिसभी प्रकार के अल्पसंख्यक हों उनपर अत्याचार तभी बहुसंख्यक करते हैं जब अल्पसंख्यक उनके आर्थिक साम्राज्य में घुसपैठ करते हैं यानी यहाँ भी अपराध का ही अर्थशास्त्र बाँचा जा रहा है। तो लब्बोलुआब यह कि अपराध उन्मूलन हेतु कितना भी कानून बने ,कितने भी प्रयास क्यों न किये जायें , क्रिमिनल्स के आर्थिक साम्राज्य को जब तक तहस नहस नहीं किया जाता अपराधी रक्तबीज की तरह जिंदा होते रहेंगे ।

©डॉ. शंभु कुमार सिंह
10 अप्रैल ,21
पटना
www.voiceforchange.in
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(अभयानंद जी की एक पुरानी तस्वीर उन्हीं के द्वारा प्रेषित!)

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