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पीतल उद्योग

by Dr Shambhu Kumar Singh

एक बहुमूल्य धातु : पीतल

पीतल एक महत्वपूर्ण धातु है।भारत ही नहीं पूरे विश्व में इसकी उपयोगिता बढ़ी है और अब स्थिति यह है कि यह सामान्य रूप से उपलब्ध नहीं होने लगी है।एक जमाना था जब हमारे घर में पीतल के बर्तन काफी हुआ करते थे पर अब स्थिति यह है कि हम इसे कम पाते हैं। पीतल देखने में सोने जैसा ही है। उतनी ही उपयोगी भी। बल्कि सोना से ज्यादा उपयोगी। पीतल के तार बनते हैं तो कलश,घरेलू बर्तन भी।पीतल के आभूषण,सजावटी सामान, मेडिकल उपकरण, बिजली में उपयोग होने वाले उपकरण आदि आदि बनते हैं। कुछ का उपयोग भी हम सब करते हैं। पीतल की एक मिश्र धातु है फूल जिसकी थाली,कटोरी भारतीय परिवारों में बहुत लोकप्रिय रही है। अब स्टील का जमाना आया और पीतल के बर्तन हमारी रसोईघर से गायब हो गए । ये बर्तन स्वास्थ्य केलिये भी काफी उपयोगी थे। पर स्थिति यह है कि अब इनका उपयोग बढ़ रहा है।

पीतल (Brass) एक प्रमुख मिश्र धातु है। यह तांबा एवं जिंक धातुओं के मिश्रण से बनाया जाता है। संस्कृत में ‘पीत’ का अर्थ ‘पीला’ होता है। यह इसके रंग (पीलापन लिए सफेद) का द्योतक है।पीतल मिश्र धातु है, जो ताँबे और जस्ते के संयोग से बनती है। ताँबे में जस्ता डालने से ताँबे का सामर्थ्य, चौमड़पन और कठोरता बढ़ती है। यह वृद्धि 36 प्रतिशत जस्ते तक नियमित रूप से होती है, पर बाद में केवल सामर्थ्य में वृद्धि अधिक स्पष्ट देखी जाती है। पीतल में 2 से लेकर 36 प्रतिशत तक जस्ता रहता है।ताँबा जस्ते के साथ दो निश्चित यौगिक Cu2 Zn3 और Cu Zn बनाता है और दो किस्म के ठोस विलयन बनते हैं, जिन्हें ऐल्फा-विलयन और बीटा-विलयन कहते हैं।
पीतल प्रधानतया दो किस्म के होते हैं। एक में ताँबा 64 प्रतिशत से अधिक रहता है। यह समावयव ऐल्फाविलयन होता है। दूसरे में ताँबा 55.64 प्रतिशत रहता है। इसमें ऐल्फा-और बीटा-दोनों विलयन रहते हैं साधारणतया पहले किस्म के पीतल में 70 प्रतिशत ताँबा और 30 प्रतिशत जस्ता और दूसरे किस्म के पीतल में 60 प्रतिशत ताँबा और 40 प्रतिशत जस्ता रहता है।
ताँबे की अपेक्षा पीतल अधिक मजबूत होता है। पीतल का रंग भी अधिक आकर्षक होता है। कुछ पीतल सफेदी लिए पीले रंग के और कुछ लाली लिए पीले रंग के होते हैं। अन्य धातुओं के रहने से रंग और चीमड़पन बहुत कुछ बदल जाता है। पीतल तन्य होता है और आसानी से पीटा और खरादा जा सकता है। पीतल पर कलई भी अच्छी चढ़ती है।
विशेष विशेष कामों के लिए पीतल में कुछ अन्य धातुएँ, जैसे वंग, सीसा, ऐल्यूमिनियम, मैंगनीज़, लोहा और निकल धातुएँ भी मिलाई जाती हैं। सामान्य पीतल की चादरों में दो भाग ताँबा और एक भाग जस्ता रहता है। कारतूस पीतल में 70 भाग ताँबा और 30 भाग जस्ता रहता है। निकल पीतल में 50 भाग ताँबा, 45 भाग जस्ता और 5 भाग निकल रहता है। ऐसे पीतल की तनन क्षमता ऊँची होती है। यदि जस्ते की मात्रा 45 प्रतिशत भाग ही रखी जाए, तो 12 प्रतिशत निकल तक तनन क्षमता बढ़ती जाती है। 45 भाग ताँबा, 45 भाग जस्ता और 10 भाग निकल वाला पीतल सफेद होता हैं। इसे निकल-पीतल या जर्मन सिलवर भी कहते हैं। आइख (Aich) धातु में 60 भाग ताँबा, 38 भाग जस्ता और 2 भाग लोहा रहता है। स्टेरो (sterro) धातु में कुछ अधिक लोहा रहता है।
जिस पीतल में ताँबा 60-62 भाग, जस्ता 40-38 भाग और सीसा 2-3 भाग रहता है, उसपर खराद अच्छी चढ़ती है। मैंगनीज़ काँसा में 60 भाग ताँबा, 40 भाग जस्ता और अल्प मैंगनीज़ रहता है। यदि मैंगनीज़ 2 प्रतिशत रहे, तो उसका रंग चोकलेट के रंग-सा होता है। यह खिड़कियों के फ्रेम बनाने के लिए अच्छा समझा जाता है। पीतल के संघनित्र नलों को बनाने के लिए 70 भाग ताँबा, 29 भाग जस्ता और 1 भाग बंगवाला पीतल अच्छा होता है। कम जस्तेवाले पीतल का रंग सुनहरा होता है। ऐसे पीतल पिंचबेक (धुँधला सुनहरा, 7-11 भाग जस्ता), टौबैंक (सुनहरा, 11-18 भाग जस्ता) अथवा गिल्डिंग धातु (3-8 भाग जस्ता) के नामों से बिकते हैं।
पीतल का व्यवहार थाली, कटोरे, गिलास, लोटे, गगरे, हंडे, देवताओं को मूर्तियाँ, उनके सिंहासन, घटे, अनेक प्रकार के वाद्ययंत्र, ताले, पानी की टोटियाँ, मकानों में लगनेवाले सामान और गरीबों के लिए गहने बनाने में होता है। लोहे से पीतल की चीजें अधिक टिकाऊ और आकर्षक होती हैं।
स्टील, फिर स्टेनलेस स्टील के दौर से गुजरते हुए लोगों की पसंद दोबारा पीतल, कासे व तांबे से बने बर्तनों पर टिक गई है। इन बर्तनों के दोबारा चलन में आने से पीतल बर्तन उद्योग को आक्सीजन मिलने की उम्मीद है। लोगों का क्रेज पीतल, कांस्य एवं तांबे से बने बर्तनों की तरफ बढ़ रहा है। दिवाली से पहले धनतेरस के दिन पर लोग पीतल, कांस्य एवं तांबे से बने बर्तनों की अच्छी खरीदारी कर रहे हैं । वहीं तांबे एवं पीतल से बने बर्तन धार्मिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण माने गए हैं।शिवलिंग पर जल अर्पित करने के लिए पीतल का कलश महत्वपूर्ण होता है। पीतल का रंग पीला होने के चलते आंखों की रोशनी तेज करने में भी यह सहायक है। आरोग्यता के साथ-साथ पेट से गैस दूर करके शरीर में ऊर्जा पैदा करने में इसके बर्तन सहायक होते हैं।
इस तरह लोगों में बढ़ती बीमारियों को कम करने के लिये भी तांबा और पीतल के बर्तनों का उपयोग किया जाता है।आपने भी कुछ लोगों को धातु से बने बर्तनों का उपयोग करते हुए देखा होगा जिसका मुख्य कारण इनसे होने वाले फायदे हैं| बाजारों में भी विभिन्न तरह के तांबा और पीतल के बर्तनों की मांग बढ़ रही है। स्टील और एल्यूनिमियम के बर्तनों में खाना खाने से गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए लोग स्टील के बर्तनों की बजाए पीतल और तांबे के बर्तनों की डिमांड कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश का मुरादाबाद अपने पीतल के बेहतरीन उत्पादों के नाते देश और दुनिया में पीतल नगरी के नाम से विख्यात है। यहां के पीतल उद्योग को बढ़ावा देने के लिए सरकार जनवरी 2018 में ही इसे जिले का एक जिला, एक उत्पाद (ओडीओपी) घोषित कर चुकी है। इससे पीतल उद्योग से जुड़े सभी लोगों को होगा। उत्पादों की गुणवत्ता सुधरने से इनका निर्यात बढ़ेगा। सरकार का मानना है कि इससे करीब दो हजार लोगों को और रोजगार मिलेगा। साथ ही स्थानीय कारीगरों की आय में सवा से डेढ़ गुना तक की वृद्घि होगी।

पीतल नगरी के नाम से मशहूर एक और शहर मीरजापुर के पीतल के बर्तनों की चमक कोलकाता से यंगून (म्यांमार) तक थी।यहां के घरों से आने वाली ठक-ठक की आवाजेंं 500 साल पुरानी पीतल नगरी के इतिहास की गवाही देती हैैं।
1868 के ब्रिटिश गजेटियर में जिले के पीतल उद्योग का उल्लेख मिलता है। यहां के बर्तन मध्य प्रदेश, बिहार, ओडिशा, असम, बंगाल समेत पूर्वोत्तर राज्यों से लेकर यंगून तक जलमार्ग से जाते थे।मीरजापुर का पीतल सदियों से तीज-त्योहार व वैवाहिक समारोहों के लिए शुभ माना जाता रहा है। छठ पूजा में लाखों की संख्या में पीतल के सूप की मांग आती है। विवाह के लिए हंडा, थार-परात, गगरा, थाली, कटोरा, लोटा, गिलास, बटुआ आदि बर्तनों की जबरदस्त पूछ है।यहां से बाहर गए व्यापारियों ने भी इस काम को नई ऊंचाइयां दी है।
बिहार के पटना से 15 किमी दूर परेव इलाके में जिले के कारोबारियों ने पीतल नगरी बना दी है।अपने पटना में उपेन्द्र महारथी शिल्प अनुसंधान संस्थान के कलाकार पीतल से अच्छी कलाकृतियां बना रहे हैं। इन कलाकृतियों को हम बिहार म्यूजियम के काउंटर पर देख सकते हैं तो गांधी मैदान के पूर्व दिशा स्थित खादी मॉल में भी खरीद सकते हैं। उपेन्द्र महारथी शिल्प अनुसंधान संस्थान इस क्षेत्र में ट्रेनिंग भी देती है। दिल्ली में जनपथ पर कितने ही इम्पोरिया है जहाँ ये कलाकृतियां हमें मिल सकती है। बाबा खड्ग सिंह मार्ग पर स्थित इम्पोरियम में भी इनकी उपलब्धता काफी है। विदेशियों को ये खूब लुभाती है। इनकी लोकप्रियता काफी है तो बिक्री भी अच्छी है। यह इनके कलाकारों को एक आर्थिक सम्बल भी प्रदान करती है। पटना में हम दीवाली के समय पटना वीमेंस कॉलेज के आगे सड़क किनारे इसे बिकते देख सकते हैं । यह बाजार एक सप्ताह ही रहता है पर इसकी खूब बिक्री होती है। धनतेरस में तो हमारे यहाँ पीली धातु खरीदने का विधान भी है। जो सोना नहीं खरीद पाते वह पीतल के ही बने सामान खरीद खुशी को गले लगाते हैं। बल्कि सोना के साथ साथ इसे भी खरीदते हैं।

मध्य प्रदेश के ऊंचेहरा में भी पीतल उद्योग की 100 से ज्यादा इकाइयां हैैं।हम पीतल के हस्तशिल्प भारतीय बाजारों में खूब देखते हैं। उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद में पीतल के हैंडीक्राफ्ट के आइटम खूब मिलते हैं। मुरादाबाद के अलावा लखनऊ ,अलीगढ़ में भी ये मिल जाते हैं।जयपुर भी पीतल के हस्तशिल्प उत्पाद हेतु ख्यात है। दक्षिण में भी हम इनकी अच्छी उत्पादकता पाते हैं।
पीतल के हस्तशिल्प में दीपदानी, घण्टियाँ,हाथी,कछुआ, गाय बछड़ा,गमले,फूलदानी आदि बने आइटम पाते हैं।सुंदर पच्चीकारी इनकी विशेषता है। इनपर रंग भी कहीं कहीं किसी आइटम पर चढ़ाया जाता है। पीतल के हैंडीक्राफ्ट का भारत में घरेलु बाजार के साथ निर्यात का भी बहुत बड़ा बाजार है।
कभी आपको भी कोई कलाकृति खरीदने की जरूरत हो तो कृपया पीतल की कलाकृतियों को एक बार जरूर देखने का कष्ट करेंगे, मुझे पूरा विश्वास है आप पहली नजर के प्यार जैसा ही कुछ कुछ महसूस करेंगे !
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©डॉ. शंभु कुमार सिंह
26 मार्च,21,पटना
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