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गाली और हमारा समाज -1

by Dr Shambhu Kumar Singh

“त्रिभंग” के बहाने गाली

जिस तरह भोजन के लिए थाली, खुश होने पर बजाने के लिए ताली की जरूरत होती है उसी तरह दूसरे को जलील करने केलिये गाली की जरूरत पड़ती है। गाली को लोग किसी को अपमानित करने हेतु व्यवहार करते हैं तो कहीं कहीं सम्मानित करने के लिए भी इसका व्यवहार होता है। कभी साली से मुठभेड़ हो जाये तो गोली की जगह गाली की बौछार होती है और मरता कोई नहीं है। पर जलालत केलिये गाली का प्रयोग आजकल हर जगह हो रहा है। घर हो ,बाहर हो ,स्कूल हो ,राजनीति हो ,टी वी चैनल हो हर जगह गाली का बोलबाला है।लोग घरल्ले से गालियों का आदान प्रदान कर रहे हैं मानो नववर्ष की शुभकामनाएं दे रहे हों!
अब तो प्यार से बोली जाने वाली गालियों की भी भरमार सी हो गयी है। कोई अपने साथी को कह रहा है ,अबे साले ,तेरी ….को ,मेरी बात सुन क्यों नहीं रहा? कोई सखी अपनी सहेली को कमीनी ,कुत्ती कह रही है मानो कोई क्यूट कमेंट हो? हमलोग जो आउट डेटेड व्यक्ति हैं इसे देख चकित के साथ भयभीत भी हैं। गाली अभी एक्स्ट्रा क्वालिफिकेशन मानी जा रही है।
बहुत घरों में लोगों को मैं देखता हूँ बच्चों को गाली देते हैं, वह भी प्यार से । पगली ,अरे पगले, कुत्ते, गदही आदि आम शब्द हैं जिनका उच्चारण अबाध रूप से हो रहा है। यह आम आदत में शुमार है। कुछ लोग तो बात बात में गाली बोलते हैं। पुलिस के लोग कम ही मिलेंगे जो गाली नहीं बोलते हों। और जो नहीं बोलते हैं वह कुछ विचित्र समझे जाते हैं।
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो गाली की बात ही समझते हैं। एक बार मैं कुछ लोगों को जो मेरे खेत मे रोज घुस कभी कुछ तोड़े तो कभी कुछ ,उनको बड़ी शालीनता से समझाया कि ऐसा नहीं करें पर बात बनी नहीं। लोग थेथर की तरह पूर्ववत खेत को बर्बाद करते रहे! फिर एक दिन मैं एक लाठी ले धाराप्रवाह गाली बकते उनकी ओर दौड़ा तो जो वे लथपथ भागे फिर दुबारा खेत में दर्शन नहीं दिए! लातों के भूत बातों से नहीं मानते! पर गाली देना सबसे निष्कृष्ट कार्य है। यह जीवन का सबसे दुखद क्षण होता है जब आप किसी को गाली देते हैं। एक सभ्य समाज में गाली केलिये कोई स्थान नहीं होना चाहिए। आज “त्रिभंग” देखते यही सोच रहा हूँ कि हम कहाँ आ गए? भाषा को हमने कितना घृणित कर दिया ? हम से तो अच्छे जानवर हैं जो लड़ते भी हैं तो गाली गलौज नहीं करते ! चिड़ियों की बात तो कुछ और है!

©डॉ. शंभु कुमार सिंह
21 जनवरी,21
पटना
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