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नाम में क्या रखा है?

by Dr Shambhu Kumar Singh

नाम में क्या रखा है?

गांव में एगो कहावत है कि नामे नाम न त अकरैले नाम! मतलब लोग को दो ही तरीके से जाने जाते हैं, या तो वह ख्यात हो या कुख्यात हो ,लोग जानते ही हैं उसको। अब बसंत सिंह जी को ही ले लीजिए,एकदम्मे कुख्यात हैं। पर माननीय विधायक हैं।अंगरक्षक मिला हुआ है। चार चार भयंकर कुत्ता गेट पर। कुत्ता ही नहीं घोड़ा, हाथी भी। आधुनिक हाथी भी मने मर्सडीज कार! क्या नहीं है बसंत बाबू को? लोग मिलते ही झुक कर प्रणाम करते हैं। मैं तो बहुत ही प्रभावित हुआ उनके इस दिव्य लोकप्रिय व्यक्तित्व से! पता किया उनके बारे में। सोचा ज्ञानी होंगे,पढ़े लिखे? पर मालूम हुआ वे मैट्रिक भी नहीं कर पाए थे । सेंटअप होने में फेल हो गए तो हेडमास्टर को ही ऊपर सेंटअप कर जो फरार हुए वो फिर कभी स्कूल का मुँह नहीं देंखे। फिर तो लगातार दूसरे को सेंटअप करते रहे। स्थिति यह बनी कि उन्होंने इतनी कुख्यात लोकप्रियता प्राप्त की कि आजिज हो भोली जनता उन्हें विधानसभा निर्विरोध सेंट कर दी। तो इसे कहते हैं नाम का महत्व!
अब तो उनको बड़े बड़े आयोजनों में बुलाया जाता है बतौर मुख्य अतिथि। वे धर्म पर ,अपराध पर ,राजनैतिक शुचिता पर धाराप्रवाह भी बोलते हैं। जनता मंत्रमुग्ध हो उन्हें सुनती है।ताली बजाती है। जयकारे लगाती है। बोलती है कि महान आत्मा हैं। सच में ,उन्होंने बड़े पुण्य के काम किये हैं कितने ही आत्माओं को परमात्मा से मिलन कराया है। इतने महत कार्य तो कोई संत शिरोमणि भी नहीं करता? बसंत बाबू तो सीधे स्वर्ग भेजते हैं। रास्ते में कहीं रुकने की व्यवस्था नहीं करते। सीधे भगवान से मिलन !
मैं भी कई सालों से विधायक बनने का सपना देख रहा हूँ। उधर सपना चौधरी को भी देखिये सांसद बनते बनते रह गयी! उसी तरह मैं भी विधायक बनते बनते रह जाता हूँ। कोई मेरा नाम ही नहीं जानता। अभी हाल ही में मुझे एक राजनैतिक दल ने प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। पर हमारे ही दल के लोग पूछते थे कि ई शंभु सिंह कौन हैं? तो यह है मेरी लोकप्रियता ? कुछ लोगों ने राय भी दी कि शंभु बाबू,अच्छे कर्म आपसे नहीं हो रहें तो बुरे ही कीजिये पर कीजिये। लोग कमसे कम जान तो जाए आपको?छोटका मोटका बाहुबली ही साबित हो जाएं ?तो यही सोच लफुआगिरी शुरू किया। पटना में लफुआ लॉज खोला। कमरा नम्बर 420 को ठिकाना बनाया पर नाकामी ही हासिल हुई। लोग मेरे तमाम प्रयास के मुझे लफुआ मानने को तैयार नहीं। बड़ी मुश्किल है!
अभी पिछले दिनों ,मुझे एक संत मिले। बोले, रे बच्चा, नाम से कुछ नहीं होता।तू कुछ कर, कुछ कर बच्चा। तू केवल फेसबुकिया लफुआ मत बन ,खुल कर आ मैदान में। मार और मार खा। क्योंकि नाम से कुछ नहीं होता। कर्म से होता है। गीता नहीं पढ़े हो कभी क्या ? यह सुन मेरे भी ज्ञान चक्षु खुले। देखा कि नाम से कुछ नहीं होता। क्योंकि लक्ष्मी को कूड़ा करकट बीनते देखा। सरस्वती को निरा मूर्ख ! हनुमान प्रसाद को बीच बाजार में मार खाते । कलक्टर जादो को भैंस चराते। वकील महतो जिंदगी भर अपने केस के लिए वकील खोजता रह गया। तो नाम से क्या होता है? नाम से ही होता तो मेवालाल अभी नहीं मेवा खा रहे होते ?
पर जो हो ,बड़की भउजी की छोटकी बहिन फुलवा तो जस नाम तस गुण ! न गुलाब का फूल पर गोभी का तो लगती ही है। एकदम्मे स्नोबॉल वेरायटी! थोड़ा गर्म मसाला डालिये और सब कॉन्टिनेंटल डिस फेल!
फुलवा याद आते ही मन विचलित हो गया। तो अब क्या लिखें? कलम को तत्काल विराम देता हूँ। पर एक बात समझ में नहीं आ रही कि जब नाम से कुछ नहीं होता तो फुलवा का मात्र नाम याद आने पर ई दिल क्यों धक धक करने लगता है? दिल में कुछ कुछ क्यों होने लगता है?
कोई फेसबुकिया ज्ञानी या व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट मित्र इस पर प्रकाश डालने की कृपा करेंगे। आभारी रहूंगा!
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©डॉ. शंभु कुमार सिंह
26 दिसम्बर,20
पटना
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