Home Blog गांधी जी और फुलवा का मेरे ऊपर प्रभाव:एक तुलनात्मक अध्ययन

गांधी जी और फुलवा का मेरे ऊपर प्रभाव:एक तुलनात्मक अध्ययन

by Dr Shambhu Kumar Singh

मेरे जीवन पर गाँधीजी और फुलवा का प्रभाव

(एक तुलनात्मक अध्ययन)

मेरा जीवन बहुत उतार चढ़ाव वाला रहा है। बचपन से अब तक मेरे जीवन पर बहुत से लोगों का प्रभाव रहा है। आइये आज इस पर गहन चर्चा हो! बल्कि कुछ कुछ अकादमिक अनुशीलन हो! तो पहले बचपन की बात करता हूँ। याद करता हूँ कि पहला प्रभाव किसका था तो कुछ कुछ याद आता है ,एक तस्वीर बनती है,वह तस्वीर है रमेसर बैठा के गदहे की। निहायत ही शरीफ,सीधा और मेहनतकश! रमेसर उसकी पीठ पर कपड़ों का गट्ठर लाद कमालपुर की पोखरी को जाता था। फिर कपड़े साफ करता और शाम को लौट आता।उसका गदहा शान्ति से भारतीय मतदाता जैसा भोलेपन में इधर उधर चरता रहता और मगन हो कभी कभी अलाप भी लगाता, बेसुरा। उस गदहे के भोलेपन से मैं बहुत ही प्रभावित हुआ।उसके साथ दो गदही भी थी। जब रमेसर कपड़े की सफाई करता ये तीनों बड़े प्यार से खेलते और खुश होते तो गाते भी। । मैं इनसे बहुत ही प्रभावित था और स्कूल से बंक कर चला जाता था पोखरिया पर। पर उसी वक्त दो घटना हुई जिससे मेरा इस गदहपनी से मोहभंग हो गया। हुआ यह कि एक बार गदहवा एक गदही को छेड़ दिया बस दोनों गदहियों ने जो दुलत्ती से इसकी धुलाई की कि क्या रमेसर कपड़े की धुलाई करता होगा! मैं उनके इस टुच्ची हरकत से दुखी हो पोखर जाना ही छोड़ दिया। परिणाम यह हुआ कि पांचवी कक्षा प्रथम श्रेणी से पास किया। यह दूसरी घटना प्रेरक बनी और खूब मन लगा कर पढ़ने लगा। इसी बीच बाबूजी गाँधीजी की आत्मकथा की किताब मुझे पढ़ने को दिए। क्या प्रेरक किताब ! पढ़ पढ़ कर एकदम गांधी बाबा जैसा बनने लगा।परिणाम यह कि लोग मुझ पर इतना विश्वास करने लगे कि किसी की खेत से खीरा तोड़ खा लेता तो लोग बोलते कि नहीं शंभु जैसा लायक लड़का ऐसा काम ही नहीं कर सकता ! स्थिति ऐसी हो गयी लोग मुझे छोटे बापू कहने लगे।आशा राम बापू नहीं। मैं भी युवा होने के बावजूद किसी लड़की की तरफ नजर उठा कर नहीं देखता। कनखी से भी नहीं। कुछ लोगों को तो शक हो गया कि मैं जो हूँ वह वास्तव में हूँ या नहीं? तो नहाने के वक्त ताक झांक भी करने लगे। क्योंकि उम्र भी बाइस तेईस हो ही रही थी और लोकल सांध्य दैनिक में मेरे बारे में कभी कोई चटपटा नहीं छपा!
स्थिति यह हुई कि गांव के लड़कों की सूची से मेरा नाम ही हटा दिया गया।सभी चिंतित। बाबूजी भी बोलते,शंभु कोई फ़िल्म इल्म देखो,टिकट का पैसा नहीं है तो लो। वे भी चिंतित हो गए थे कि कहीं यह साधु न हो जाये! इसी बीच मेरे जीवन में एक धमाकेदार इंट्री हुई। एक चिंगारी की,जो आग लगा दे। सबकुछ भस्म कर दे।हुआ यह कि बड़के भइया की शादी हो गयी। बड़की भउजी घर आगयी। भउजी तो आयी ही उनके साथ उनकी छोटी बहन फुलवा भी आई। एकदम स्नोबॉल फूलगोभी! देखते ही मन हरियर हो गया। इस फुलवा ने मेरे जीवन पर अमिट असर डाली। जीवन एकदम गांधीधाम से बॉलीवुड हो गया। फुलवा हो गयी मेरे फिलिम की हीरोइन! तो आज शाम जब चिंतन करने बैठा हूँ तो मन थोड़ा थोड़ा अकादमिक हो रहा है। सोचता हूँ अपने जीवन पर ग़ांधी बाबा और फुलवा बेबी के प्रभाव का एक तुलनात्मक अध्ययन लिख ही डालूं ताकि नई पीढ़ी को ज्ञान का प्रकाश मिल सके! तो लीजिये ,संक्षेप में उस पर चर्चा कर दे रहा हूँ।
कहाँ गांधी बाबा और कहाँ फुलवा बेबी? कोई तुलना ही नहीं। जहाँ गांधी बाबा नशा विरोधी वहीं फुलवा तो चढ़ती नशा। एकदम शराब की दरिया।डुबो तो होश नहीं। फुलवा के आंखों में भी नशा। हर अंग में नशा! तो तुलनात्मक रूप से पाया कि गांधी बाबा जहाँ शराब का विरोध करते हैं, वहीं फुलवा खुद शराब। नशा ही नशा। तो फुलवा का यह प्रभाव पड़ा कि बिहार में शराबबंदी के बावजूद होम डिलीवरी कर शराब मंगवाने लगा और रहने लगा हर वक्त टुन्न! दूसरी बात यह कि गांधी बाबा अहिंसा के पुजारी । हिंसा के विरोधी। पर फुलवा तो ऐसी कि जो देखे वह खल्लास! जो उसके प्यार में पड़े, मर जाये। दोनों व्यक्ति दो छोर पर। गांधी बाबा जीवन में उबरने का रास्ता बताते हैं वहीं फुलवा डूबने का। जो बौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ ! तो मैं डूबने को आतुर ! इस तरह बहुत बुरा प्रभाव पड़ा फुलवा का मुझपर।
गांधी जी जहाँ रास्ता दिखाते हैं वहीं फुलवा भटका देती है। जाना है पूरब तो फुलवा को देख चल दो पश्चिम ! अजीब माजरा है? मैं नादान पूरा भटक गया। बिहार की राजनीति जैसा। पर एक बात पर दोनों एक मत कि प्रेम करो । सबसे प्रेम। गाँधीजी बोलते थे कि कोई एक गाल पर चांटा मारे तो दूसरा गाल आगे कर दो, फुलवा भी वही करती है। एक पर किस करो,दूसरा गाल भी हाजिर है। तो बहुत ही कम्प्लिकेशन है इस तुलनात्मक अध्ययन में ! दो दो छोर के व्यक्तियों के प्रभाव का तुलनात्मक अध्ययन करना ! अंतिम निर्णय यही कि गांधी जी का जो सकारात्मक प्रभाव मुझपर पड़ा वह फुलवा की संगति के कारण समाप्त हो गया। मैं वैसा ही बन गया जैसे आज के राजनेता। एकदम निष्कृष्ट! उनके बंदर जैसा भी नहीं रह सका! अफसोस!
अरे रुको फुलवा,इसे लिखना खत्म होने दो न ! ओहहो ! माफ करना मित्रो, अभी इतना ही लिख अध्ययन खत्म करता हूँ। फुलवा दूसरा गाल आगे की हुई है। फिर मिलते हैं किसी दिन आपसे एक नई रचना के साथ । आज माफ करो।
शुभ रात्रि !
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©डॉ. शंभु कुमार सिंह
29 अक्टूबर,20
पटना

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